हाँ अगर मैं नहीं लिखती तो मारी जाती
मारी जाती अपने ही शब्दों के बोझ तले
बह जाते आँखों से अनकहे सिलसिले।
अपेक्षाओं आकांक्षाओं की गहरी खाई में
धँस कर मर जाती किसी की परछाई में
संवेदनाओं के ऊंचे पर्वत से
ढह जाती मैं किसी नाचीज़ की करवट से।
रूढ़ियों की खींची सुक्ष्म लकीरों में
बँध जाती मैं अदृश्य जंजीरों में।
अपनी ही खामोशियों के शहर में
खोई मिलती मैं सन्नाटों के कहर में।
सदियों से बंद मन के तहखानों से
डर कर मर जाती मैं रिश्तेदारों के तानो से
रिश्तों और समाज की उलझी गिरह से
टूट कर बिखर जाती मैं उस एक शख्स के विरह से
अंतर्दाह की सिसकती आहो में
हर ख़्वाब को चुपचाप दफ़्नाकर,
भटकती फिरती अजनबी-सी राहों में,
दफ़्न होते कितने ख़्वाब, बंदिशों की पनाहों में।
अपने ही अस्तित्व से बिछड़कर,
बुझते चिराग़-सी अँधेरे में ढलकर,
जिम्मेदारियों के बोझ से लड़कर
कटी पतंग-सी दिशाओं में भटककर,
मारी जाती मैं
मौत से पहले की मौत से डरकर।।
ArUu ✍️