दिन ढल गया, रात आई है,सन्नाटे ने दुनिया सजाई है।
थक गई हैं अब यह आँखें,सोने की एक रुत आई है।
जो छूट गई बातें आज यहाँ,उन्हें ख्वाबों में बुनते हैं।
अब रख दो कलम को थोड़ा दूर,चलो खामोशी को सुनते हैं।
आँखें मूंदो, आराम करो,अब यहीं पे रुकते हैं।
कल मिलेंगे तो फिर लिखेंगे,नए दिन की नए सिरे से बातें।