रात्रि के अंधकार को चीरती हुई जब पूर्व दिशा में लालिमा बिखरती है, तब एक शांत और पवित्र वेला का आरंभ होता है। इसे ही भोर या प्रभात कहते हैं।
इस समय संपूर्ण प्रकृति एक अलौकिक शांति और ताजगी से भर जाती है। मंद-मंद शीतल वायु चलने लगती है, जिसमें पेड़ों के पत्तों की सरसराहट और ओस की बूंदों की सिहरन समाहित होती है। आकाश का रंग धीरे-धीरे नीले से सुनहला होने लगता है, मानो धरती पर किसी नए जीवन का अवतरण हो रहा हो।
पेड़ों की शाखाओं पर बैठे पक्षी अपनी मीठी और कोमल आवाज़ों से संपूर्ण वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं। दूर क्षितिज पर सूर्य देव के आगमन का आभास होते ही कलियां अपनी पंखुड़ियां खोलने लगती हैं और फूलों की महक चारों ओर फैल जाती है।
यह पल मन को असीम शांति, सकारात्मकता और एक नई ऊर्जा से भर देता है, जो समस्त जीवों को आलस्य त्यागकर अपने कर्मपथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।