रूप की राधिका जब घटाओं से मिलती है,
जैसे कली कोई चुपचाप सुबह खिलती है।
नैन उसके कहें झील सा गहरा कोई पानी,
होंठों पे जैसे बहारों की रवानी मिलती है।
चाल ऐसी कि हर मोड़ पे थम जाए हवा,
उसकी हर एक अदा जैसे कोई जादू-भरा
जुल्फें बिखरें तो लगे रात उतर आई हो ज़मीं पर,
उसके होने से ही हर जख्म को मिल जाती है दवा।