हर साल एक दिन राखी का आता है,
भाई कलाई पर धागा बंधवाता है।
बहन के हाथों में मिठाई थमाकर,
संसार सारा अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है।
पर क्या नारी का मान सिर्फ इक दिन का है?
क्या उसका वजूद केवल एक भाई के बहन का है?
जिसके आंचल में पलता है पूरा यह संसार,
उसी को हर रोज क्यों सहना पड़ता पहरा है?
कलाई पर सजा रेशम का धागा काफ़ी नहीं,
अगर मन में उसके प्रति आदर का भाव बाकी नहीं।
सम्मान कोई पर्व नहीं, जीवन का अधिकार है,
हर बेटी, हर नारी से ही तो यह घर-परिवार आबाद है।
चलो यह कसम खाएं कि यह दौर बदलेंगे,
साल के हर दिन उसकी गरिमा को संवारेंगे।
नारी सिर्फ राखी के दिन ही नहीं पूजी जाएगी,
हर पल, हर साँस में उसकी शक्ति सराही जाएगी।