मैं और मेरे अह्सास
ग़ज़ल की खामोशी
ग़ज़ल की खामोशी क्या कहना चाहती हैं l
जेहन में सुर ताल के संग बहना चाहती हैं ll
तन्हाई में चुपकीदी को ओढ़कर बस यूँही
शब्दों की धड़कनों का मौन सहना चाहती हैं ll
शायरी और शेरों के भाव को ज़िक्र ना कर l
अंदर ही अंदर काफ़िया पहना चाहती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह