हीन भावना में यदि महत्वाकांक्षा का रोग लग जाये, तब वह कुण्ठा में बदलती है। व्यक्ति जो होना चाहता है वो हो नहीं पाता। अतः वह स्वयं को हीन बताकर कृपा के द्वार से ऊपर आना चाहता है। यदि आ जाये तब उसकी पूर्व की महत्वाकांक्षा तो मर जाती है किंतु हीन भावना यथावत रहती। कृपा सोचकर करो!!