लौटती कविता
जब-जब मैं तुम्हें भूलने की कोशिश करता हूँ,
एक कविता लौट आती है।
वो चुपचाप बैठ जाती है
मेरी मेज़ पर रखी अधूरी किताबों के बीच,
और तुम्हारा नाम लिख देती है
मेरे हर खाली पन्ने पर।
मैं उसे मिटाना चाहता हूँ,
पर शब्द फिर उग आते हैं,
जैसे सूखी धरती पर
बरसात की पहली बूंदें।
वो कविता लौटती है
कभी तुम्हारी हँसी बनकर,
कभी तुम्हारी ख़ामोशी बनकर,
और कभी एक ऐसे दर्द की तरह
जिसका कोई इलाज नहीं होता।
समय बहुत आगे निकल आया है,
मगर कुछ एहसास आज भी वहीं खड़े हैं,
जहाँ तुमने आख़िरी बार मुड़कर देखा था।
और तब समझ आता है—
कुछ लोग नहीं लौटते,
मगर उनकी यादों से जन्मी कविताएँ
उम्र भर लौटती रहती हैं।॥