शरीर आराम चाहता है,
हालात पैसे कमाने पर मजबूर करते हैं,
मन सुकून की तलाश में भटकता है,
और दिल… अपनों को अपना बनाए रखने में पूरी उम्र लगा देता है।
इंसान की पूरी ज़िंदगी एक अजीब-सी दौड़ बन जाती है
पैसा चाहिए तो सुकून खो जाता है,
सुकून चाहिए तो ज़िम्मेदारियाँ रोक देती हैं,
और रिश्ते चाहिए तो खुद को समझाना पड़ता है।
हम कल को बेहतर बनाने के लिए
आज को लगातार टालते रहते हैं।
फिर एक दिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो समझ आता है—
जिस ज़िंदगी को बेहतर बनाने में पूरी उम्र लगा दी,
उसे जीने का वक्त ही नहीं मिला।
शायद जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है—
इंसान पूरी उम्र ज़िंदगी को संभालता रहता है,
और अंत में एहसास होता है कि
ज़िंदगी तो कब की हाथों से निकल चुकी थी।