ज्यादा समझदारी भी इंसान को अकेला कर देती हैं। पर इस समझदारी में शांति और सुकून होता हैं आज जब सबका असली चेहरा मेरे सामने आ गया हैं तब बस ये एक बात समझ आई...लोग सिर्फ झूठे ही नहीं वह बुरे हैं इतने की वह किसी की भावनाओ के साथ खेल भी सकते हैं और दूसरो के रोने पर हंस भी सकते हैं। हर मंदिर जाने वाला और व्रत रखने वाला इंसान अच्छा नहीं होता वो बस इन सब धार्मिक कार्यो के पीछे अपने गलत कामो छुपा रहे होते हैं। ऐसे लोगो को कभी अपनी गलती का एहसास नहीं होता । इन्हें दूसरो के आसूं बहते देखकर खुशी और सुकून मिलता हैं शायद वेदो और पुराणो में जिन राक्षसो की बात की गई हैं वह ये लोग ही हैं। मैं राक्षसो से मिल चुकी हूं अब भगवान का मिलना बाकी हैं। अब भी ईश्वर के इंतजार मैं....
Priya kashyap....