कभी अंधेरों में तारों से मुलाक़ात की है ?
कभी आसमान में उस चांद को शर्माते देखा है ?
कभी टूटते तारे से कुछ मांगा है ?
कभी सड़कों पर बेवजह निकल कर देखा है ?
कभी मंजिल के बिना सफर पूरा किया है ?
कभी ढूंढने में कुछ पाने को खुद को बेवक्त ज़ाया किया है ?
कभी एक क़दम पीछे लेकर नई उड़ान भरने को दिल किया है ?
कभी अपने शहर से भाग कर नए शहरों में खुद को पाया है ?
कभी भटक रहे थे जिस सुकून की तलाश में उसे खुद में ढूंढा है ?
कभी जिसे दूसरों में ढूंढते थे उसे ख़ुद में ढूंढ के देखो शायद वो मुस्कुराहट मिल जाए ?
कभी ख़ुद से प्यार कर के देखो क्या पता दुनिया की सारी खुशियां फ़ीकी पड़ जाए ?
क्या पता वो उदास चेहरा एक बार फ़िर से खिल जाए ?