अस्तित्व- एक पहचान
संघर्ष करती हूं,
खुद को ढूंढ़ती हूं।
इस ख़लक मजारों में
जो प्रीत बसा वो मीत कहा?
कह रही मेरी वेदना पुकार
तू कौन?
तेरा अस्तित्व क्या?
तुमने जन्म लिया तो,
ये जश्न कैसा?
तू मर रहा तो ये अंध क्या?
नाम मिला तात से ,
संस्कार मिला मैया से,
फिर तू कौन?
तेरी पहचान क्या?
है यह मोह-माया की दुनियां,
सब ईश्वर का खेल है।
कठपुतली बन नाच रहे,
प्रेम ईष्र्या का डोर है।
पैसा तुमने खूब कमाया ,
तो तेरी देन है क्या?
तू कौन ?
तेरी पहचान क्या?
बना महान तो गुरु का देन,
तो ये झूठा बखान क्यों?
तू कौन? तेरी पहचान क्या?
_गायत्री कुशवाहा