शीर्षक: मैं सड़क हूँ*
*- डॉ वंदना शर्मा*
मैं सड़क हूँ, मैं कहीं नहीं जाती
दुनिया मुझ पर चलती है
एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं
और पूछते हैं कभी किसी से
ये सड़क कहाँ जाती है
मैं सबको ले जाती हूँ
सबको मंजिल तक पहुँचाती हूँ
पर खुद कहां पहुँच पाती हूँ कहीं
मैं तो ठहरी हूँ वहीं
कैसी है ये दुनिया
मतलब निकलने पर भूल जाती है
ना कोई श्रेय ना कोई शुक्रिया
मैं कौन तू कौन-
परिचय भी भूल जाती है
जैसे अंधा कोई आँख सही होते ही
सबसे पहले फेंकता है लाठी
खाना खाते ही शादी में किसी की
सबसे पहले भागते है बराती
सच है याद भी किसी को यहाँ
किसी की जरूरत पड़ने पर आती
मैं तो सड़क हूँ, मैं कहीं नहीं जाती
सबको पहुँचाती, सबकी मंजिल
खुद स्वयं को हमेशा तनहा पाती
भीड़ में जग की , मेरी आवाज तो
कहीं यूँ ही गुम हो जाती
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi