शून्य का अर्थ
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आपने किसी भी सिनेमाघर में फिल्म के सफेद पर्दे को देखा है? जरा अंक ० को सिर्फ समझने के लिए उससे जोड़े। जैसे पूरी फिल्म की कहानी या पात्र के सुख और दुख उस पर्दे पर ही अंकित हो रहे है ,पर उस सफेद पर्दे के अस्तित्व में कोई भी फर्क नहीं, चाहे कॉमेडी सीन हो, या विध्वंस का सीन हो, वह केवल उसे प्रतिबिंबित करता है।
अब 0 को पृथ्वी के बाहर की स्पेस के साथ जोड़े जहां कही पर भी पृथ्वी के अपने नियम न लागू पड़ते हो। वह स्पेस को भी अपने आप में सिनेमा के पर्दे के साथ जोड़े।
तो वह स्पेस रूपी 0 पृथ्वी की गतिविधियों को और ऐसे बहुत सारे ग्रहों और तारो की गतिविधियों को लेकर अपने आप में कुछ भी नहीं।
अब छोटे से 1 साल के बच्चे के जीवन को समझे उस पर समाज की शिक्षा, धर्म,ज्ञाती और भेद भाव का कोई प्रभाव नहीं वह पूर्ण रूप से स्पेस यानी 0 में है। जैसे ही वह समाज के साथ जुड़ता है,वह धरती की तरह भारी हो जाता है, फिर सफलता और विफलता की अपनी गति में सुखी और दुखी होता रहता है। उसे अपना अस्तित्व ही दिखने लगता है।
"संसार की सारी चीजें (सृष्टि) उत्पन्न होती हैं और मिट जाती हैं"।वे पनपती हैं, फलती-फूलती हैं और अंततः अपने मूल स्रोत (शून्य) में लौट जाती हैं।
अत: तुम जिस भी परिस्थिति में हो ,जरा रुको ,ठहरो और देखो सभी स्थितियां शून्य में लौट जाती है।" ( लाओत्से)
जब आप समय की प्रत्येक धारा को शून्य से उत्पन्न या शून्य में ही जाती देखते हो तो वह सिनेमा के पर्दे वाला भाव आपके अंदर आएगा, जहां फिल्म शुरू भी होगी, अपना समय लेगी और खत्म हो जाएगी।
यह दृष्टि गुढ़ है, इस पूरे लेख पर आँखे बंध कर शांति से चिंतन करे, आपके अपने भीतर नए आयाम खुलेंगे।