हिंदुस्तान में शादियाँ कुछ इस तरह होती हैं,
दूल्हा-दुल्हन का पता नहीं,
पर रिश्तेदारों की रज़ामंदी ज़रूरी है।
शादी का यह खेल कुछ यूँ शुरू होता है,
लड़के का चाल-चरित्र कुछ पता नहीं,
पर खानदान रईसों का ज़रूरी है।
लड़की के स्वभाव का पता नहीं,
पर तन की सुंदरता ज़रूरी है।
फिर कुछ आगे बढ़ता है ये खेल यहाँ,
अब बारी दूल्हे की नीलामी की होती है,
जितनी मोटी तनख़्वाह उसकी,
उतनी मोटी बोली लगती है।
दूल्हा की शिक्षा का पता नहीं,
पर लाखों का दहेज ज़रूरी है।
और बढ़े कुछ आगे तो,
अब तारीखें तय होती हैं।
प्यार-दोस्ती को वक्त मिले ना मिले,
पर इन तारीखों पर ग्रह-नक्षत्रों का मिलना ज़रूरी है।
दूल्हे-दुल्हन की पसंद का पता नहीं,
पर इनकी कुंडलियों का मिलना ज़रूरी है।
सब कुछ तय होने पर,
वक्त रस्म-रिवाज़ों का आता है।
पूजा-अर्चना का पता नहीं,
पर मेहमानों को तोहफ़े देने की रस्म ज़रूरी है।
दिल से किए सम्मान का पता नहीं,
पर तोहफ़ों की ऊँची कीमत बहुत ज़रूरी है।
हफ्तों की तैयारी के बाद,
दिन शादी का आता है।
भले ही ना समझे हों एक-दूसरे को,
पर शुभ मुहूर्त पे फेरों के संग,
दोनों को जन्म के बंधन में बाँध दिया जाता है।
नम होती हैं पलकें सबकी,
जब वक्त विदाई का आता है।
मिल जाए तोहफ़ों के नाम पे दहेज जब,
उठती है दुल्हन की डोली आखिर तब।
हिंदुस्तान में शादियाँ कुछ इस तरह होती हैं,
दूल्हा-दुल्हन का पता नहीं,
पर समाज की रज़ामंदी ज़रूरी है।