जब आतें हैं सावन
मेरी अखियों में,
विध्न पड़े सखी री
मेरी पखियों में!
दूर कहीं वो रहते हैं
रहता दूर नहीं हिया
निर्मोही सब कहते हैं
माने नहीं मेरा जिया,
काक सब मांस खाइयो
वो बसे इन अखियों में!
ढूँढूं बापुरी मैं निगोड़ी
हंस सी तेरी मेरी जोड़ी
प्राण दिए जो तू मिले
कीमत लगे पर थोड़ी,
आ छिप जा हिये मेरे
होड़ लगी सखियों में!