मैं वो लड़की हूं जिसने घर की चार दीवारी से ही धरती के उत्तरी गोलार्ध से दक्षिणी गोलार्ध घूम कर आ गई।
अपनी काल्पनिक दुनिया में........
कभी मनाली में बर्फ की बारिश को महसूस करती हूं तो
कभी रेगिस्तान के धोरो में अठखेलिया करती हूं।
कभी बनारस की गंगा आरती में लीन हो जाती हूं तो
कभी दार्जिलिंग के चाय बागानों की खुशबू में खो जाती हूं।
कभी गोवा के समुद्र तट पर खुद को भागते देखती हूं तो
कभी पहाड़ों की शान्ति में खुद को मौन पाती हूं।
जब में अपनी बनाई दुनिया का जिक्र घर में करती हूं तो
बदले में हर बार की तरह एक ही जवाब मिला " अपने पति के साथ घूमना"
फिर में जबान लड़ा देती हूं अगर उसको घूमना घुमाना पसंद ना हुआ तो
मैं अपने सपने किसी दूसरे पर क्यों थोंपू।
अगर उसे पत्नी की जरूरत ना हो उसे नौकरानी की जरूरत हुई तो घूमूंगी ना......
कभी घर से बाजार भाजी का मोल भाव करते हुए तो
कभी हॉल से किचन तक भाग दौड़ करते हुए।
कभी पति में ही दुनिया देखते तो
कभी मेरे आराध्य से शिकायत करते।
जानती हु आपके मन में सवाल आ रहा होगा सपने देखे है तो उनको सच करने की काबिलियत भी रखो।
समस्या काल्पनिक को वास्तविक में बदलने की नहीं है...
मध्यम परिवार की मैं पढ़ी लिखी लड़की इजाजत से बंधी हूं।
इजाजत ना मिलने का विरोध में नहीं कर पाऊंगी
खुद अपने हाथों से अपने सपनों का गला घोट जाऊंगी।।
✍️ अंतिमा 😊