थोड़ा और सफर बढाओं मुसाफिर के लिए
सुरज से कहों, आज रहने दो कल डुब जाना
सोचा खुदखुशी करके देख लूँ
तेरे वादा की रस्सी चढ़के देख लूँ
मील के पत्थर को अपनी मंजिल समझकर
अधुरें सफर में खुद को रक्खा हमने
उस पेड़ की डाल पर परिन्दे जगागें रातभर
जिस पेड के नीचे सय्याद हो सोया