चाँद भी दिखा तो खिड़की से
वे वजह छत पे उम्र गुजारी हमने
गिनों तारें रात भर
जो सो चुके वो ख्वाब गिनों
मेरी कश्ती डुबने ही वाली है बस
जरा और कुछ देर समंदर किनारे बैठो
हमने गुल उगाये हैं पतझड़ में
बहार लौटी तो चौंक पड़ी
जानें किस बात का सदमा है मुझे
रो पड़ता हूँ, कोई लतीफा सुनाकर
जिस जगह तेरा दामन उलझा पड़ा है
वहां दम तोड़ा था कभी रुमाल ने मेरे