मेरे घर के अंधेरे हार जाते
गर जो रुख से नाकाब तू हटा देता
मन जी उठा पुरानी तस्वीर देखकर
कुछ मेरे बचपन की, कुछ जबानी की
जो भी जीने का हक रखता है
चाहे हो वो मेरा कातिल
जिन्दगी पूरी पत्थर ढुढ़ने में लगा दी
आज मिला पत्थर, तो हाथ से पागल निकला
गुबार उड़ाओ चाहे जितना
सितम नहीं तो सफर कैसा