जब-जब शाम गोमती के जल में उतरती है,
लखनऊ की रूह धीरे-धीरे निखरती है।
हवा में घुली तहज़ीब कानों को छू जाती,
हर गली मोहब्बत की खुशबू-सी दे जाती।
रूमी दरवाज़ा जैसे बाँहें फैलाए खड़ा,
इतिहास की यादों को सीने में लिए बड़ा।
इमामबाड़ों की दीवारें चुपचाप ये कहतीं,
यहाँ की मिट्टी में सदियों की दास्ताँ रहती।
हज़रतगंज की शामें जैसे दुल्हन सजती हैं,
रोशनियों की चूड़ियाँ सड़कों पर बजती हैं।
चौक की पुरानी गलियाँ दिल को बुलाती हैं,
हर मोड़ पे बीती यादें चुपके मुस्काती हैं।
“पहले आप” यहाँ सिर्फ़ बोली नहीं लगती,
ये तो लखनऊ वालों की धड़कन-सी लगती।
छोटी-सी बातों में इतना प्यार मिलता है,
अजनबी चेहरों में भी अपना यार मिलता है।
टुंडे की खुशबू जब हवाओं में बहती है,
भूख नहीं, बस दिल की चाहत जागती रहती है।
कुल्हड़ वाली चाय में जो अपनापन मिलता,
वैसा स्वाद दुनिया के शहरों में कहाँ खिलता।
गोमती किनारे बैठो, रात गुनगुनाती है,
चाँदनी भी जैसे कोई ग़ज़ल सुनाती है।
लखनऊ को लिखना आसान कहाँ होता है,
ये शहर नहीं… दिल का सबसे हसीन हिस्सा होता है।