मुझे एक बात समझ नहीं आती
ये औरते इतनी औरते कैसे होती है भाई
बिल्कुल ही खुद के अस्तित्व को नकारती।
इन्हें किसी एक राह पर छोड़ दो, ये उसी राह पर चलती रहेगी।
राह सही हो या गलत इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता बस ये अपनी तरफ से कभी सही राह खोजने की कोशिश नहीं करती।
इन पर जितने चाहे रिवाज-कुरीतियां थोप दो ये बस बिना सिर उठाए उनका अनुसरण करती रहेगी
और जो इनके लिए आवाज उठाए उन्हें तो वो अलग ही हीन नजर से देखती है जैसे वो उनके बने बनाए ढर्रे पर आग लगा देगी। कभी कभी लगता है ये औरतें डरती है
जिस सुविधा क्षेत्र में वो अभी रह रही हैं उसे खोने से या जो उन्हें आसानी से हासिल है उसके छीन जाने से।
शायद अपने लिए आसमान खोजने में भी वो डरती है क्योंकि उसके लिए अथाह गहराई में उतरना पड़ता है।
वो उन स्त्रियों से भी डरती है जो पुरुषों के बुने चक्रव्यूह को ताड़ने का साहस रखती हैं।
वो डरती है शायद खुद की असीमित शक्तियों से भी ।
सच मैं आज तक नहीं समझ पायी ।
ये औरते इतनी औरते क्यों होती है।