🍁पृथा की कथा🍁
यावज्जीवन हाय यही अनुताप,
एक स्वीकार...बस एक स्वीकार ।
कर्ण तुम्हें देती अधिकार,
एक स्वीकार...बस एक स्वीकार।
अनुताप क्या यह अश्रुधारा...
नहीं कर्ण !
मर्त्य गात्र में कसकती तुम्हारी मरणोन्मुख माता;
न रखेगी गुप्त,
कह देगी मर्मान्तक पीड़ा का प्राबल्य सारा।
अन्तस्तल में मंथित एक विचारधारा,
तुम्हें ठुकरा कर,
किया तुम्हारा अनादर।
और शोकार्त हृदय यूँ चूका,
वहीं पुत्र तुम्हारे माता का प्रेम हारा।
क्यों कर्ण ?
क्या सहज ही ममता पराजित हो सकती है?
संदेह तो है पुत्र... वह भी कह दो!
कह दो... मेरी ममता आडंबर है,
हारती नहीं परन्तु तुम्हें हरा जाती है।
ममता पर आक्षेप सही नहीं पुत्र,
सुर्य-पृथा की संतान!
न अंत्य मनुज से तुम सम हो।
क्यों पुत्र,
तुम्हें ममता पर भ्रम हो?
हाँ! यह सत्य है,
जीवन-सौन्दर्य समेटने को तुम्हें त्याग आई।
परन्तु क्या मात्र अभिराम-जीवन की इच्छा ही,
थी हृदय पर छाई?
कुल की मर्यादा,
अपने भ्रष्ट संयम से नष्ट कर दें,
क्या ऐसा स्त्री को है अधिकार?
क्या ये पुरषों का समाज करता मुझे स्वीकार?
करतल की रेखाओं में खींच संतान की रेखा,
कल्पना ने दिया सत्य को आमंत्रण।
कौतुकवश वह सुर्य-आवाहन!
इन्द्रिय वश इच्छा थी वह,
जो पुर्ण हुई।
मेरी एक इच्छा तुम भी थे पुत्र,
क्यों मैं यावज्जीवन तरसी?
आदर्शों का दीपा लोक,
समक्ष स्त्री के।
बुझ जाती है अंतर की कल्पना,
सत्य में सुलग के।
स्वीकार्य हो जाता है ममता पर सांकल;
अपने ही पांव में बांधी बेड़ी,
नयन भर देख पाने की इच्छा में व्याकुल।
काट डालोगे तुम सारे तर्क बनकर राधेय,
पता है।
परन्तु असंदिग्ध एक सत्य,
है मेरा रूधिर वह,
नस-नस में जो तुम्हारे समुद्र सा उफनता है।
क्षोभ युक्त साधित मौन तुम्हारा,
कहे स्वांग सरीखी मातृक व्यथा।
यही पुत्र बस यही,
प्रत्येक युग में रहेगी अभागिन पृथा की कथा....।।
- श्री कृति