आज रात की खामोशी में जब अकेले बैठकर कुछ सोच रहा था, तो वक्त की रफ़्तार का ख्याल आया। हम आज कहाँ हैं, किसके पीछे भाग रहे हैं और किसके लिए रुक रहे हैं...
ये सोचते-सोचते अचानक एक हिसाब दिमाग में आया कि 2026 चल रहा है, तो यानी 100 साल बाद, 2126 में हम में से कोई ज़िंदा नहीं होगा! इसी कशमकश को मैंने कुछ यूँ लफ़्ज़ों में पिरोया है--
वक्त की मुट्ठी से फिसलते हम सब एक दिन रेत हो जाएंगे,
2126 की किसी पुरानी तस्वीर में महज़ एक याद रह जाएंगे।
ना कोई अमीर होगा वहां, ना किसी की नाराज़गी का शोर होगा,
ना ये भागदौड़ होगी, ना कल को पाने का कोई जोर होगा।
दफन हैं जो ख्वाब दराज़ों में, उन्हें आज ही जी कर देख लो,
ज़िन्दगी अगर एक जाम है, तो उसे कतरा-कतरा पी कर देख लो।
तो दोस्तों, क्यों ना आज उन शिकायतों को दफन कर दें जो हमें अपनों से दूर करती हैं?
याद रखिएगा, कल की दौड़ में हम आज खो रहे हैं। खुद का ख्याल रखिए, अपनों को गले लगाइए और बस मुस्कुराइए...
क्योंकि ये पल दोबारा लौटकर नहीं आएगा। सोचिएगा ज़रूर, क्या हम वाकई जी रहे हैं, या बस वक्त काट रहे हैं?"
— आपका दोस्त, इरफ़ान खान