ऐसी भी अन्तरदशा चलती है
सब झूठ लगता है इसलिए
सबसे रुचि समाप्त होने लगती है
न लिखने का मन होता है
न पढ़ने का न बोलने का न ही
सुनने का जैसे सारी बातें भ्रम फैलिने की कोशिश कर रहे हैं ।
जैसे स्वांस को कोई बाँध रहा है
पिंजरे में बन्द छटपटाहट
जब आप कुछ नहीं करना चाहते
और करने को बहुत कुछ छूटा सा हो .....,,
- Ruchi Dixit