"निर्दय"
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दया निर्दय है
सुकून की मिठास
जहर से भी कारीगर साबित होती ही है।
पतन से ही
इंसान को परखा जा सकता है।
किसी के हाथों में
सत्ता का चाबुक दो
फिर देखो
जिसपर दया रिसती है
उसके छिले बदन से पूछो
करुणा कहा है।
ठंड में बैठी उदासी
अंधकार से बुझने के बाद
अवसाद तले दबे व्यक्तित्व
में उकेरे गए हज़ारो नग्न साये
छूते है आसमान को।
जीत और हार
अलग नहीं है
उनके होने से ही
खेल बनता है।
निराशा ही अंतिम शरण है
आशा का कोई अस्तित्व नहीं
बस भ्रम में उपजे खयाल
ही युद्ध को लेकर चलते हैं।
भागते रहना नियति है
बैठे रहना पसंद
अकेलापन ही वास्तव है
कोई निवारण नहीं होना ही
हर बात का सृजन है।
बारिश चाहती हैं पेड़ को
पेड़ प्रेम में है जमीन के
जमीन कुछ नहीं चाहती।
पैर हवा में शुष्कता लिए
लटके हैं
अंतिम हिस्सा मौत नहीं
न जिंदगी है
ये बस किसी बंद दरवाजे की तरह
कही भी नहीं खुलते।
वस्त्र में ढके
सभी नंगों को
सूचित करते हुए
वासना कायम रहती हैं।
व्यभिचार पकड़ा जाता है
तभी पाप में तब्दील होता है
मन तो कोई गलती ही नहीं करता
दिमाग को बहलाने के अलावा।
डर आखिरी विराम चिन्ह नहीं है
उसके आगे भी लिखा जा सकता है
सजा किसी को नहीं होती
पर हर एक जकड़ा है
शून्य के पाश में।
सबको माफ करते हुए
सबकी माफी मांगते हुए
जाना ही पाखंड है।
जाना ही पाखंड है
रुकना भी कोई सत्य नहीं
बस दिशाओं के बीच
लटका हुआ निर्णय है
जो कभी लिया ही नहीं गया।
मुक्ति की बातें
थके हुए लोगों की आदत हैं
जंजीरें पहने-पहने
वे उन्हें आभूषण समझने लगते हैं।
चुप्पी
कोई शांति नहीं होती
यह बस शब्दों का
अपने ही खिलाफ
गवाही देने से इनकार है।
जो झुकता है
वह बचता नहीं
बस टूटने की प्रक्रिया को
धीमा कर देता है।
भीतर जो बचा है
वह भी पूरा नहीं है
टुकड़ों में बंटा हुआ मन
खुद को ही जोड़ते-जोड़ते
और बिखर जाता है।
सत्य
कभी सामने नहीं आता
वह हमेशा
किसी झूठ की पीठ पर बैठकर
सवारी करता है।
और हम
उसके पदचिन्हों को
धर्म समझ लेते हैं।
नींद में देखे गए सपने
जागने के बाद
सबूत नहीं होते
फिर भी
उनके डर से कांपता हुआ शरीर
किसी भी तर्क से बड़ा होता है।
ईश्वर
अगर कहीं है
तो वह भी शायद
किसी कोने में बैठा
अपने ही बनाए नियमों से
बचने की कोशिश कर रहा होगा।
और अगर नहीं है—
तो जो कुछ है
वह और भी ज्यादा
निर्दयी है।
अंत
कोई घटना नहीं
बस एक आदत है
जिसे हम
हर बार नए नाम से
दोहराते हैं।
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