ख्वाब में!!!!!
कुछ रोशनी चिराग़ों में छुपा रखी ख़्वाब में,
चमकती चाँदनी ने सब चुरा लिया ख़्वाब में।
हक़ीक़त की तपिश से बचने की चाह में,
हर एक दर्द हमने सह लिया ख़्वाब में।
जो बात कह न पाए हम किसी भी बज़्म में,
उसी ख़ामोशी ने सब कह दिया ख़्वाब में।
टूटे हुए यक़ीं जब बोझ बन गए ज़ेहन पर,
उम्मीद ने हमें फिर से थाम लिया ख़्वाब में।
वो लोग जो कभी अपन नज़र न आ सके,
उन्हीं अजनबियों ने दिल छू लिया ख़्वाब में।
दुनिया की राहों में तो क़दम डगमगा गए,
“प्रसंग” ने मगर जीवन जिया ख़्वाब में।
-प्रसंग
प्रणयराज रणवीर
बज़्म- सभा, जमावड़ा
यक़ीं- विश्वास
ज़ेहन- मन, दिमाग