Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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ऋगुवेद सूक्ति-- ९ की व्याख्या,--
ऋग्वेद ८/१/५
“महे च न त्वामद्विवः परा शुक्लाय देयाम्।”
भावार्थ --हे महान और अद्वितीय ईश्वर! हम‌‌ आपको अपने हृदय से शुद्ध भावों के‌ साथ‌ समर्पित करते हैं जिससे हमारा जीवन पवित्र उज्जवल और तेजस्वी मार्ग की ओर‌अग्रसर‌ हो।
1️⃣ उपनिषद से प्रमाण
(क) मुण्डकोपनिषद 2/2/10
“ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।”
👉 भाव — ब्रह्म ही यह समस्त विश्व है, वही परम और शुद्ध है।
शुक्ल (पवित्र) ब्रह्म में समर्पण का यही उपनिषदिक सिद्धांत है।
(ख) कठोपनिषद 2/15
“न तत्र सूर्यः भाति न चन्द्रतारकम्…”
👉 भाव — परमात्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है।
ऋग्वेद का “शुक्लाय” उसी स्वयंप्रकाश ब्रह्म की ओर संकेत करता है।
(ग) श्वेताश्वतर उपनिषद 6/19
“न तस्य कश्चित् पतिरस्ति लोके…”
👉 भाव — उसका कोई शत्रु, प्रतिद्वन्द्वी या स्वामी नहीं।
यह सीधे “अद्विवः” (जिसका कोई द्वेषी नहीं) का उपनिषदिक समर्थन है।
2️⃣ भगवद्गीता से प्रमाण
(क) गीता 7/18
“उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।”
👉 भाव — ज्ञानी भक्त मुझे अपना आत्मस्वरूप मानकर समर्पित होता है।
यह वही “परा देयाम्” (पूर्ण समर्पण) है।
(ख) गीता 14/6
“तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकम्…”
👉 भाव — सत्त्वगुण निर्मल, शुद्ध और प्रकाशक है।
“शुक्लाय” = सत्त्वमय, ज्ञानमय जीवन-पथ।
(ग) गीता 12/6–7
“ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य…”
👉 भाव — जो सब कर्म मुझे अर्पित करते हैं, मैं उनका उद्धार करता हूँ।
ऋग्वेद के देयाम् (अर्पण) का स्पष्ट गीता-सिद्धांत।
3️⃣ पुराणों से प्रमाण
(क) विष्णु पुराण 1/2/10
“सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम्।”
👉 भाव — सत्त्व ही ब्रह्मदर्शन का मार्ग है।
यह शुक्ल मार्ग की पुष्टि करता है।
(ख) भागवत पुराण 1/2/6
“स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।”
👉 भाव — परम धर्म वही है जिससे ईश्वर में शुद्ध भक्ति उत्पन्न हो।
यह महान् ईश्वर में निष्काम समर्पण का पुराणोक्त प्रमाण है।
(ग) भागवत पुराण 3/29/11
“मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये।”
👉 भाव — ईश्वर का स्मरण हृदय को शुद्ध करता है।
यही शुक्लता का आंतरिक रूप है।
4️⃣ अन्य आर्ष ग्रंथों से प्रमाण
(क) महाभारत – शान्ति पर्व
“न देवो विद्यते कश्चिन्नारायणसमः प्रभुः।”
👉 भाव — नारायण के समान कोई नहीं।
यह अद्विवः (अद्वितीय, निर्वैर) का स्पष्ट समर्थन है।
(ख) हितोपदेश
“शुद्धाचारः परो धर्मः।”
👉 भाव — शुद्ध आचरण ही परम धर्म है।
ऋग्वेद का शुक्लाय यही जीवन-दृष्टि सिखाता है।
(ग) भर्तृहरि – नीति शतक
“सत्त्वं गुणानामधिपं प्रवाहम्।”
👉 भाव — सत्त्व सभी गुणों का नेतृत्व करता है।
वेद का शुक्ल मार्ग = सत्त्व प्रधान जीवन।
🔔 समग्र निष्कर्ष
ऋग्वेद 8/1/5 का संदेश—
महान, अद्वितीय, निर्वैर परमात्मा में शुद्ध, उज्ज्वल, सत्त्वमय जीवन हेतु पूर्ण समर्पण। यही वेद → उपनिषद → गीता → पुराण → आर्ष परंपरा की एकसूत्री धारा है।
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Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112015697
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