Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

Quotes quotes are very popular on BitesApp with millions of authors writing small inspirational quotes in Hindi daily and inspiring the readers, you can start writing today and fulfill your life of becoming the quotes writer or poem writer.

ऋगुवेद सूक्ति --८ की व्याख्या --
न विन्धेश्य‌ सुष्टतिम्।
ऋगुवेद --१/७/७
भावार्थ -मैं‌ प्रभु की स्तुति का पार नहीं पा सकता हूँ। अर्थात प्रभु देते‌ हुए नहीं थकते परन्तु मैं स्तुति करते हुए थक जाता हूँ। प्रभु भाव से रीझते हैं। इसलिए ईश्वर को केवल शब्दों से नहीं, शुद्ध भाव-कर्म से ही पाया जाता है—
उपनिषद् और गीता से प्रमाण-
🔶 उपनिषद् से प्रमाण
1. कठोपनिषद् १.२.२३
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥
भावार्थ –
यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से,‌ न अधिक श्रवण से प्राप्त होता है; जिसे वह स्वयं स्वीकार करता है, उसी पर अपने स्वरूप को प्रकट करता है।
2. मुण्डकोपनिषद् ३.१.८
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः… (उपर्युक्त मंत्र का पुनः प्रतिपादन)
3. ईशोपनिषद् मंत्र- १
ईशावास्यमिदं सर्वं…
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
अर्थ –
त्यागपूर्वक भोग करो।
त्याग-भाव के बिना की गई स्तुति सुष्टुति नहीं कहलाती।
🔷 श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण
1. गीता- ७.१६
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
➡️ भगवान स्पष्ट करते हैं—
सुकृतिनः (शुद्ध कर्म वाले) ही भजन कर पाते हैं।
अर्थात केवल उच्चारण से नहीं, कर्मशुद्धि से स्तुति सिद्ध होती है।
2. गीता ९.२६
पत्रं पुष्पं फलं तोयं
यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
➡️ यहाँ भक्ति और प्रयतात्मा (शुद्ध अंतःकरण) पर बल है,
न कि बाह्य वैभव या शब्दाडंबर पर।
3. गीता १७.२८
अश्रद्धया हुतं दत्तं
तपस्तप्तं कृतं च यत्
असदित्युच्यते पार्थ…
➡️ श्रद्धा के बिना किया गया यज्ञ, दान, तप—सब असत् है।
🌺 निष्कर्ष (वेद–उपनिषद–गीता की एकसूत्रता)
वेद कहते हैं— सुष्टुति दुर्लभ है
उपनिषद् कहते हैं— आत्मा शब्दों से नहीं मिलता
गीता कहती है— श्रद्धा और शुद्ध कर्म ही भक्ति है
👉 तीनों का एक ही संदेश है:
ईश्वर को वाणी नहीं, साधना स्वीकार्य है।
🔶 1. महाभारत से प्रमाण
(क) शान्ति पर्व
न भावशुद्धेः परतोऽस्ति धर्मः।
अर्थ –
भाव की शुद्धता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
➡️ ऋग्वेद १/१/७ से साम्य
अग्नि को सुष्टुति तभी मिलती है जब स्तुति भावशुद्ध हो।
(ख) वनपर्व
न देवाः स्तुतिमात्रेण तुष्यन्ति
नृणां कदाचन।
अर्थ –
देवता कभी भी केवल स्तुति-मात्र से प्रसन्न नहीं होते।

🔷 2. हितोपदेश से प्रमाण
1. मित्रलाभ प्रकरण
न हि सेवा फलं दत्ते
वचनैर्न च दम्भतः।
कर्मणैव हि सिद्ध्यन्ति
देवाः सन्तश्च सर्वदा॥
अर्थ –
सेवा का फल न तो केवल वचन से मिलता है, न दिखावे से;
देव और सज्जन कर्म से ही सिद्ध होते हैं।
➡️ यही है सुष्टुति का मर्म।
2. हितोपदेश
आचारः परमो धर्मः।
➡️ आचार के बिना की गई स्तुति अधूरी है।
🔶 3. भर्तृहरि (नीतिशतक) से प्रमाण
1.
न स्तुत्यै न नमस्कृत्य
न दानैर्न च कर्मभिः।
शुद्धेन मनसा देवः
पूज्यते नान्यथा कचित्॥
अर्थ –
न स्तुति से, न नमस्कार से, न दान से; देवता (ईश्वर) केवल शुद्ध मन से पूजित होते हैं।

2.
भावो हि कारणं पुंसां
न शब्दो न च कर्मकृत्।
➡️ कारण भाव है—न केवल शब्द।
🔷 4. चाणक्य (नीतिसूत्र) से प्रमाण
1.
न भज्यते देवता शब्दजालैः
न चापि वेषैर्बहुभिः।
यः शुद्धभावेन सदा प्रवर्तते
तमेव देवाः सततं भजन्ति॥
अर्थ –
देवता न शब्दजाल से पूजे जाते हैं,न बाह्य वेष से; जो शुद्ध भाव से चलता है, देव उसी का संग करते हैं।
2.
शुद्धभावो जयत्येव
न तु वाक्चातुरी कचित्।
➡️ वाणी की चतुराई नहीं,
अंतःकरण की पवित्रता ही विजयी होती है।
🌺 समन्वित निष्कर्ष--


ऋग्वेद कहता है- सुष्टुति दुर्लभ है
उपनिषद् कहता है -आत्मा शब्दों से नहीं जाना जाता।
गीता कहतीं है--श्रद्धा-कर्म प्रधान
महाभारत कहता है--भावशुद्धि ही धर्म है।
हितोपदेश कहता है --कर्म से देव सिद्धि।
भर्तृहरि कहते हैं--शुद्ध मन ही पूजा है।
चाणक्य कहते हैं--
भाव प्रधान है , न कि वाक्पटुता।
👉 सर्वत्र एक ही स्वर—
ईश्वर को शब्द नहीं, साधक का भाव चाहिएं ।
🔶 1. भागवत पुराण से प्रमाण
(क) भागवत पुराण 10.14.3
ज्ञाने प्रयत्नमुदपस्य नमन्त एव
जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्।
स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिः
ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोकीम्॥
भावार्थ –
हे भगवन्!
जो ज्ञान-प्रयत्न का अहं छोड़कर,
श्रद्धापूर्वक आपकी कथा सुनते हैं,वे ही आपको जीत लेते हैं।
➡️ संकेत
यहाँ वाणी की चतुराई नहीं,
नम्रता और श्रद्धा प्रधान है।
(ख) भागवत पुराण 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो
यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकी अप्रतिहता
यया आत्मा सुप्रसीदति॥
➡️ अहैतुकी भक्ति = निष्कपट भाव।
यही सुष्टुति है।
🔷 2. विष्णु पुराण से प्रमाण
विष्णु पुराण 1.19.41
नाहं वेदैर्न तपसा
न दानेन न चेज्यया।
शक्यः प्राप्‍तुमयत्नेन
भक्त्या त्वनन्यया॥
भावार्थ –
मैं न वेद-पाठ से, न तप से,
न दान से; केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता हूँ।
➡️ यह वेद-भाव की स्पष्ट पुष्टि है।
🔶 3. पद्म पुराण से प्रमाण-
पद्म पुराण
न स्तुतिभिर्न च पूजाभिः
केवलैर्न च कर्मभिः।
भावशुद्ध्या हृषीकेशः
तुष्यते नान्यथा कचित्॥
भावार्थ –
न केवल स्तुतियों से,
न केवल पूजाओं से;
भगवान भाव-शुद्धि से ही प्रसन्न होते हैं।
🔷 4. नारद पुराण से प्रमाण
नारद पुराण--
न मन्त्रतन्त्रसिद्ध्या च
न तीर्थव्रतसंयमैः।
भावमात्रेण गोविन्दः
तुष्यते सततं नृणाम्॥
➡️ मंत्र-तंत्र नहीं,
भाव प्रधान।
🔶 5. शिव पुराण से प्रमाण
शिव पुराण--
नाहं वसामि वैकुण्ठे
न योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति
तत्र तिष्ठामि नारद॥
➡️ जहाँ भक्तिभाव है,
वहीं ईश्वर है—न कि शब्दाडंबर में।
🌺 पुराण-सम्मत निष्कर्ष
पुराण स्पष्ट करते हैं—
स्तुति आवश्यक है पर केवल स्तुति पर्याप्त नहीं
भाव-शुद्धि + कर्म-शुद्धि = सुष्टुति
👉 यही ऋग्वेद १/७/७ का मर्म है, जिसे पुराणों ने भक्तिभाषा में उद्घाटित किया है।
🔶 1. योगसूत्र (महर्षि पतञ्जलि) से
योगसूत्र 1.23
ईश्वरप्रणिधानाद्वा।
अर्थ –
ईश्वर में पूर्ण समर्पण से ही सिद्धि होती है।
➡️ यहाँ प्रणिधान का अर्थ है—
केवल जप या स्तुति नहीं,
अहंकार-रहित समर्पण।
➡️ यही ऋग्वेद की सुष्टुति है।
🔷 2. मनुस्मृति से प्रमाण
मनुस्मृति,- 2.85
श्रुतिस्मृत्योर्विरोधे
स्मृतिरेव गरीयसी।
तयोर्विरोधे धर्मः स्यात्
भावशुद्ध्या प्रतिष्ठितः॥
➡️ धर्म का मूल भावशुद्धि है,
न कि केवल वाचिक विधि।
मनुस्मृति -12.3
शुभाशुभफलं कर्म
मनसा समुपाश्रितम्।
अर्थ –
कर्म का शुभ-अशुभ फल
मन (भाव) पर ही आश्रित है।
➡️ शब्द गौण, भाव प्रधान।
🔶 3. योगवासिष्ठ से प्रमाण
योगवासिष्ठ-
न स्तोत्रैर्न च दानैर्न
न तीर्थैर्न व्रतैस्तथा।
चित्तशुद्धिर्हि मोक्षस्य
कारणं नान्यथा कचित्॥
अर्थ –
न स्तोत्र, न दान, न तीर्थ, न व्रत—
मोक्ष का कारण केवल चित्त-शुद्धि है।
➡️ यह वेद-वाक्य का दार्शनिक विस्तार है।
🔷 4. नारद भक्ति सूत्र से प्रमाण
नारद भक्ति सूत्र- 2
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।
➡️ भक्ति = परम प्रेम,
न कि केवल वाणी।
नारद भक्ति सूत्र- 9
तस्मिन्परमप्रेमरूपा।
➡️ जहाँ प्रेम-भाव है,
वही सच्ची स्तुति है।
🔶 5. शाण्डिल्य भक्ति सूत्र से
शाण्डिल्य सूत्र-
सा परानुरक्तिरीश्वरे।
➡️ ईश्वर में अनुरक्ति (आंतरिक लगाव)—
यही वास्तविक उपासना है।
🔷 6. महर्षि याज्ञवल्क्य (स्मृति) से
याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.8
आचारात् धर्ममिच्छन्ति
धर्मादैश्वर्यमुत्तमम्।
➡️ आचार से ही धर्म,
धर्म से ही ईश्वर-कृपा।
योगसूत्र--समर्पण आवश्यक
मनुस्मृति--भाव ही मूल
योगवासिष्ठ-चित्तशुद्धि
नारद सूत्र--प्रेम-भक्ति
शाण्डिल्य-अनुरक्ति
याज्ञवल्क्य--आचार प्रधान
👉 निष्कर्ष
ऋषि परंपरा सर्वत्र एकस्वर है—
ईश्वर को शब्द नहीं, शुद्ध साधक चाहिए।
------+-------+------++-------+-+-

Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112015597
New bites

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now