"अनाम सा"
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क्या बात कहूं उससे
जो मुझसे परे होकर भी
देखता है कि कुछ भी नहीं देखता।
उसका होना मेरे लिए महज एक संयोग है,
या सच में किसी आईने की तरह
वह मुझे रोज़ खिचड़ी बालों में
कंघी घुमाते हुए देखता है।
उसका कोई नाम नहीं,
पर क्या बस नाम ही
किसी चीज़ को वजूद देता है?
अस्तित्व होने से नहीं होता।
वह तो बस मेरी कल्पना से भी परे कुछ है,
जिसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती,
जिसके बिना साँस छोड़ते हुए
मैं बुदबुदाता हूँ हवा को।
और उसकी झलक न दिखते हुए भी
महसूस होने की भावना से भी ऊपर का
कुछ मुझे छू जाता है।
लेकिन यह स्पर्श ज्ञान नहीं है।
उसे तो किसी भी मानवी संवेदना में
बाँधा नहीं जा सकता।
अंधकार में हिलता हुआ वह
हिल भी नहीं रहा होता।
मुझे मालूम है—
उसका यही न होना
मुझे उससे जोड़े रखता है।
जैसे बारिश की पहली मिट्टी की गंध में
नहाया हुआ मेढक
किसे देखता है?
उसकी डरावनी ध्वनि में
छुपा तत्व मुझे क्यों नहीं बोध होता।
क्या बस बंधन में बंधे
मांझे को पतंग के होने की
भावना महसूस नहीं होती?
किसी विलुप्त अवकाश में
उसका छुपा रहना क्या है,
या शायद मुझे ठीक एड्रेस पता नहीं है।
उसे ढूंढा नहीं जा सकता,
क्योंकि छुपना, खोजना—
यह सब इंसानी साज़िशें हैं।
मानवीय नियम वगैरा
झूठे नहीं हैं,
पर वह मेरे आयाम का हिस्सा होते हुए भी नहीं है।
या यूँ कहा जा सकता है
कि मनुष्य बस है—
जिसने अभिजीत को नहीं छुआ है।
बस किसी कोने में बसी हुई
अपनी सभ्यता उसे ढूंढती है।
उनके साथ भी यही होता होगा,
जिन्हें वह कभी दिखा
या शायद दिखा नहीं होगा।
एक बात कहूं—
वह कोई ईश्वर
या महबूब नहीं है।
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