१६…“जब समय सो जाता है”
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कभी-कभी लगता है —
घड़ी की सुइयाँ नहीं चल रहीं,
बल्कि किसी की नब्ज़ धीरे-धीरे थक रही है।
घर की दीवारों पर लटकी छायाएँ
अब भी बीते दिनों के वाक्य दोहराती हैं,
जैसे कोई अधूरी प्रार्थना
किसी पुराने मंदिर के गुंबद में अटकी हो।
हवा में धूल नहीं,
किसी की अस्थियाँ तैरती हैं —
जो अब भी पहचान चाहती हैं,
किसी नाम के बिना।
मुझे लगता है
मृत्यु का सबसे कोमल रूप
वह है — जब कोई लौटना छोड़ देता है,
बिना शोर किए।
रात की नमी में
एक पुराना सपना साँस लेता है —
वह जिसमें मैं किसी के कंधे पर
अपनी नींद रख आया था।
अब वही नींद हर रात
मुझसे लौटने की भीख माँगती है।
मैं उसे कहता हूँ —
“थोड़ा और ठहर जा,
यह जो अँधेरा है,
यही मेरी जाग है।”
और सच में —
कभी-कभी मैं देखता हूँ
समय खुद सो गया है,
और उसके सीने पर
एक चाँद करवट लेकर
धीरे-धीरे बुझ रहा है।
तब मैं समझता हूँ —
जीवन का अर्थ
मृत्यु से डरना नहीं,
बल्कि उस क्षण को पहचानना है
जब मृत्यु थककर
हमारे भीतर सो जाती है।
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