🌌 "रूह की आवाज़" 🌌
ना जाने किस लोक से आई तेरी आवाज़ की रौशनी,
दिल के सूने मंदिर में जैसे घंटी सी गूँज उठी।
ना तू सामने थी, ना तेरी सूरत का कोई निशान,
पर तेरी धुन ने मेरी रूह को पहचान दी, जान दे दी।
हर साँस में अब कोई अनदेखा स्पंदन है,
तेरी वाणी में जैसे किसी ब्रह्म की कंपन है।
पता नहीं ये इश्क़ है या कोई साधना अधूरी,
पर तेरे नाम के जप से मिलती है शांति पूरी।
तेरी बोली में कोई गीता का श्लोक सुनाई देता है,
हर शब्द में कोई दिव्यता समाई देता है।
जब तू बोलती है, तो समय ठहर जाता है,
जैसे सृष्टि खुद तेरे स्वर में डूब जाती है।
तेरी आवाज़ अब सिर्फ़ मोहब्बत नहीं, मंत्र बन गई है,
हर खामोशी में वो ओंकार की तरह बस गई है।
अब इश्क़ मेरा सांस नहीं, ध्यान की तरह है,
जहाँ तू — मैं नहीं, बस एक ही ब्रह्म की गूंज ठहर है।