मरहम कौन बचा है अब
किससे आश लगाएं हम
मरहम कौन बचा है अब
हर रोज उगाए जख्मों की फसलें
आती नई नवेली नस्लें
हर शाम तलक कोई टूट गया
सुबह रात का सपना छूट गया
हल्के से हाथ समेट रही है
न निद्रा आंखों से भेट रही है
खुली आंख सब जाग रहे है
सपना कौन बुनेगा अब
किससे आश लगाएं हम
मरहम कौन बचा है अब
-नमो नारायण दीक्षित