अनुचित
अनुचित है तुम्हारा ..
इस कदर मुझसे नजरे मिलना ,
मेरे जहन में उपस्थित रहना ,
मेरे ख्यालों में अधिकार जताना ..
तुम ...तुम्हारे साथ ...
ना है मेरे कोई संवाद ...
ना कोई गहरा परिचय ...
ना वाद .. और ना ही विवाद
फिर ...अनुचित है ना ...
ये हुनर तुम्हारा ...
मेरे दर्पण में ..
अक्श बन तुम्हारा उभर जाना ...
अनुचित है ना ..
तुम्हारे ये सर्द से ख्याल
तुम्हारी ये रज़ा ...
और ...
अनुचित है .....मेरे समझौते ...
अनुचित है ...
तुम्हारी परछाईयों में
मेरा पहलू बदलना ...
तुम्हारे अलफ़ाज़ों की ओस से ..
सम्मोहित होना ..
अनुचित है ...
तुम्हारे बंधन से
स्वतन्त्र होना ..
अनुचित है तुम्हारी..
गुंजाइशों को सवारना ..
मेरा तुम संग मुस्कुराना
तुम्हारे दो पलों को सुनना ..
कि .... ये बग़ावते तुम्हारी
अनुचित है ...
मुझे बागी बनाना
अनुचित है ...
प्रिये ....
सर्वथा अनुचित ...
सुनीता