व्यथा .. वृथा ही ..
व्यथा .. वृथा ही ..
अंग लगी मेरे l
मैं त्यागी कितना ..
वह संग चली मेरे l
अनुगामिनी मेरी ... वह संगिनी मेरी,
हर पथ पर .. मेरे दंश सह चली वह !
मुझमे विलुप्त अव्यक्त मर्म मेरे
कह चली वह ..!
व्यथा मेरी .. बस वृथा ही ...
मेरा मान जब अभिमान कहलाया ,
लालसा कहलायी अभिव्यक्ति मेरी ,
संघर्ष मेरा जब प्रश्नो में रहा ,
तिमिर के उर में जब ..
बस गया अस्तित्व मेरा ,
तब व्यथा .. वृथा ही सहेली बन ,
रंग रंगी मेरे ... संग चली मेरे l
अटखेलियां ना की मैने ..
स्वप्न ना बुने कभी l
गुंजाइशे ख्वाइशों की तो थी नहीं ,
लुप्त रहीं रंजिसे मेरी l
सेतु टुटा जब मन बांधों का ,
आलम्बन बन गयी व्यथा मेरी ...
बस वृथा ही ...
बिंधित ह्रदय से .. आह ना निकली ,
शुष्क नयनो से .. अवसाद ना बरसे ,
शैल सी काया .. मृत सा मन मेरा
आहुति बना जीवन समर ,
अंगीकार किया मैने उसे भी तत्क्षण l
मूक हर स्पंदन में ..
वह व्यथा मेरी अपनी ..
संगिनी मेरी .. अंग लगी मेरे
संग चली मेरे , वृथा ही ...!
~ सुनीता