४...“मुझे छोड़ दो”
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महकता हुआ मुझे छोड़ दो,
तालाब तू —
कुएँ की गहराई में मुझे छोड़ दो।
अपनी कश्ती को कभी डूबने न दिया,
उन आँखों में —
अब मुझे छोड़ दो।
किसने बनाए हैं ये नियम?
कानून की दहलीज़ पर
मुझे तोड़ दो।
हर रूह भटकती है,
निगाहें तरसती हैं,
खुले काले आसमान में
मेरी कश्ती मोड़ दो।
काटने दो तारे,
सूरज को मुझे मरोड़ने दो।
किसने देखा है?
कि जन्नत में भी फँसता है आदमी —
मुझे सुकून भरे नर्क की छाँव में छोड़ दो।
यहाँ आसान नहीं कुछ भी पाना,
तो पाने की भूली राह में
मुझे छोड़ दो।
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