*आईने की वह कहानी*
रातों के सन्नाटे में जब खुद से मिली,
आईने में अपनी परछाई से मैं खिली।
चेहरा वही, पर नज़रें परायी थीं,
मुस्कुराहटों में छिपी वे सच्चाइयाँ भाई थीं।हर दिन किसी और की इच्छा बनी,
अपनी ही चाहत से मैं दूर चली।
हँसी के मुखौटे में आँसू थे ढले,
सपनों के दीपक आँधियों में जले।फिर किसी पल भीतर का स्वर जागा,
एक धीमी पुकार ने मन को थामा।
कलम थामी, शब्दों की शरण में आई,
अपने ही भावों की संगिनी बन पाई।ना कहना भी अब साहस बन गया,
थक जाना भी मेरा पल बन गया।
अब अपूर्णता नहीं कोई दोष लगे,
हर टूटन में भी नवजीवन जगे।आज वही आईना हँसता मेरे संग है,
मेरा हर प्रतिबिंब अब मेरा रंग है।
अब डर नहीं, अब भार नहीं,
बस अपनापन है — और प्यार सही।मैंने पाया खुद को अपनी ही दृष्टि में,
फिर जन्म लिया अपनी ही सृष्टि में।
@आर्यमौलिक