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उलझी हुई ज़िंदगी
उलझी हुई है ज़िंदगी हर किसी की,
कभी हँसी में तो कभी आहों में बसी।
पता नहीं क्या चाहती है ये ज़िंदगी,
कभी सुकून तो कभी बेचैनी सी रची।
बेमतलब सी भागती है ये ज़िंदगी,
राहें अनजानी, मंज़िलें भी अजनबी।
कभी सपनों के रंग भरती है हाथों में,
कभी वक़्त के काँटे देती है राहों में।
कभी ख़ुशियों के फूलों से महक जाती है,
कभी ग़म के अंधेरों में भटक जाती है।
सीख देती है धैर्य, सब्र और उम्मीद,
गिरकर सँभलने की देती है तमीज़।
हम सोचते हैं हम इसके मालिक हैं,
पर असल में ये हमें ही चलाती है।
हर मोड़ पर एक नया सबक सिखाती है,
गिरते-गिरते हमें मज़बूत बनाती है।
उलझनों के बीच ही सुलझना सिखाती है,
ग़म के बीच ख़ुशी के लम्हे दिखाती है।
यही तो है इस ज़िंदगी की असली कहानी,
ख़ुद को खोजने की एक अनकही निशानी।