"चाँद से गुफ़्तगू"
ऐ चाँद, तू क्यों मुझसे ख़फ़ा सा लगता है,
क़रीब होकर भी क्यों जुदा सा लगता है।
तेरी चाँदनी भी अब सुकून नहीं देती,
ये नूर-ए-शब दिल को सज़ा सा लगता है।
कभी तू मेरी ख़ामोशी का हमसफ़र था,
मगर अब तेरा आना भी फ़ासला सा लगता है।
तेरी यादों में कभी ढूँढा करती थी ख़ुद को,
अब हर ख़्वाब भी मुझे दग़ा सा लगता है।
न कोई हसरतें बाकी रही अब मुझमें,
भीतर मेरे जैसे कुछ मरा सा लगता है।
तेरे बग़ैर दिल वीरान पड़ा है "कीर्ति",
हर लम्हा अब दर्द-भरा सा लगता है।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️