मुफ़्त की एयरबैग तकनीक!
😩😩😩😩😩😩😩
समाचार यह है कि एक महाशय दीवार से टकरा गए। आम आदमी होता तो नाक चपटी, दाँत टूटे और मुँह से खून की धार बह निकले। मगर यहाँ दृश्य बिल्कुल उल्टा था—महाशय के चेहरे पर हल्की मुस्कान, दाँतों की चमक जस की तस और नाक वैसी ही अकड़ में खड़ी। कारण? उनकी तोंद, जिसने समय रहते झटका सोख लिया।
जनाब, तोंद अब सिर्फ़ पेट नहीं रही, यह जीवन की सुरक्षा-नीति है। यह ‘मेड इन इंडिया’ एयरबैग है, जो न महँगे बीमे का प्रीमियम मांगती है, न किसी बटन से खुलती है। 24 घंटे, सातों दिन, हर मोड़ पर तैनात रहती है। कोई ठोकर लगे, कोई दीवार भिड़े या भीड़भाड़ में धक्का खाओ—तोंद आगे बढ़कर शरीर को बचा लेती है।
डॉक्टर कहते हैं—“शुगर बढ़ जाएगी, बीपी चढ़ जाएगा।” मगर असलियत यह है कि वही तोंद ज़रूरत पड़ने पर इंसान को गिरने से बचा लेती है। यह अलग बात है कि सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त वही तोंद साँस फूलने का कारण भी बन जाती है। लेकिन भाई, सुरक्षा और सुविधा का संतुलन तो हर इनोवेशन में होता है।
ज़रा सोचिए, आज की गाड़ियों में जबरन एयरबैग लगवाना पड़ता है, पर आदमी के शरीर में प्रकृति ने पहले ही एक एयरबैग-प्रोटोटाइप फिट कर दिया है। फर्क बस इतना है कि गाड़ी का एयरबैग एक बार फूले तो दोबारा खर्चा आता है, जबकि इंसान की तोंद रोज़ खाने-पीने से खुद-ब-खुद फूलती रहती है—वह भी बिना मेंटेनेंस कॉस्ट।
तो खबर यही है:
“जहाँ तोंद है, वहाँ सुरक्षा है।
जहाँ सुरक्षा है, वहाँ आत्मविश्वास है।
और जहाँ आत्मविश्वास है, वहाँ आदमी दीवार से भी टकराकर मुस्कुरा सकता है।”
🤪🤪🤪🤪🤪
आर के भोपाल।