मान्यवर,
भारतीय साहित्य में स्त्री विमर्श कोई नया या आयातित विचार नहीं है। यह हमारी परंपरा में प्राचीन काल से विद्यमान है।
ऋग्वेद की ऋषिकाएँ—घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी—इस बात की साक्षी हैं कि स्त्री केवल घर की चौखट तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान और वैचारिकता की ध्वजा भी रही है। रामायण की सीता और महाभारत की द्रौपदी धैर्य और प्रतिरोध, दोनों के प्रतीक बनकर सामने आती हैं।
भक्ति काल में मीराबाई और अक्का महादेवी जैसी संत कवयित्रियों ने पितृसत्ता की बेड़ियाँ तोड़ीं और आत्म-अभिव्यक्ति का नया स्वर दिया। आधुनिक युग में प्रेमचंद, टैगोर और फिर महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, महाश्वेता देवी, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के जीवन-संघर्ष को साहित्य के केंद्र में लाया।
भारतीय स्त्री विमर्श की विशेषता यह है कि यह केवल विद्रोह की पुकार नहीं है। यह परिवार और संस्कृति के संतुलन को भी महत्व देता है। यहाँ स्त्री को पीड़िता नहीं, बल्कि परिवर्तन और समरसता की वाहक माना गया है।
अंत में कहना चाहूँगा—भारतीय साहित्य हमें यह सिखाता है कि स्त्री न तो मौन है, न हाशिए पर। वह इतिहास की निर्माता है और भविष्य की दिशा-दर्शक भी।
आर के भोपाल।
धन्यवाद।