मोहन भागवत: राष्ट्र के तपस्वी सारथी !🇮🇳
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत, एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो अपनी सादगी और गहन वैचारिकता के लिए जाने जाते हैं। उनका जीवन किसी राजनेता की तरह चकाचौंध से भरा नहीं, बल्कि एक तपस्वी के एकांत और एक विचारक की निरंतर साधना का प्रतिबिम्ब है। उनके जन्मदिन ११सितम्बर पर, हम उनके अस्तित्व की परतों को खोलकर देखते हैं, जो केवल एक पद पर आसीन व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसे सारथी हैं जो राष्ट्र के रथ को उसकी सनातन पहचान की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।
भागवत जी का व्यक्तित्व मिश्रित और विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है। एक ओर, वे संघ की अनुशासित परंपरा का निर्वाह करते हुए कठोर और अटल दिखाई देते हैं। दूसरी ओर, उनके संवादों में एक सौम्यता, सहजता और हास्य का स्पर्श मिलता है, जो श्रोताओं को सहजता से बांध लेता है। वे मंच पर भले ही एक गंभीर विचारक हों, पर निजी जीवन में एक विनम्र और सरल व्यक्ति हैं। उनका यही द्वैत, उनके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाता है।
भागवत जी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी वैचारिक स्पष्टता और दृढ़ राष्ट्र-निष्ठा है। उनका मानना है कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति और परंपराओं में बसती है। वे 'हिन्दुत्व' को किसी धर्म से जोड़कर नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति के रूप में देखते हैं, जो सबको साथ लेकर चलने का दर्शन देती है। उनके भाषणों में, वे अक्सर समाज के हर वर्ग को जोड़ने, सद्भाव बनाए रखने और राष्ट्र निर्माण में सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर देते हैं। वे किसी भी विषय पर बात करते हुए इतिहास, दर्शन और वर्तमान की चुनौतियों को सहजता से जोड़ते हैं।
उदाहरण के लिए, उन्होंने कई बार स्पष्ट किया है कि सभी भारतीय एक ही पूर्वज के वंशज हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।
उनके नेतृत्व में, संघ ने अपने दायरे को और विस्तृत किया है। वे अब केवल राजनीतिक मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मुखरता से अपनी बात रखते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघ का उद्देश्य केवल राजनीतिक सत्ता नहीं, बल्कि एक समर्थ, सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण है।
भागवत जी और संघ को अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। उन पर ध्रुवीकरण और संकीर्ण राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन, वे इन आलोचनाओं को अक्सर अपनी सहजता और तर्कों से जवाब देते हैं। वे कहते हैं कि संघ किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत के लिए है। उनका यह दृष्टिकोण उन्हें एक शांत और परिपक्व नेता बनाता है जो वैचारिक हमलों से विचलित नहीं होता।
आज, जब देश एक वैचारिक चौराहे पर खड़ा है, वहां वे सही अर्थों में एक राष्ट्र-निर्माता हैं, जो अपनी वैचारिक साधना से एक नए भारत की नींव रख रहे हैं।
आर के भोपाल।