मोहब्बत बुरी है, बुरी है मोहब्बत...!
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यह दिल का वह खेल है, जहाँ नियम सब जानते हैं, मगर मानते कोई नहीं। ज़ुबान से कहते हैं, "इस आग से दूर रहो, जल जाओगे," मगर ख़ुद ही पतंगे की तरह इस शमा पर न्यौछावर हो जाते हैं। यह जानते हुए भी कि इस राह पर सिर्फ़ काँटे हैं, हम नंगे पाँव ही दौड़ पड़ते हैं।
मोहब्बत एक ऐसा मीठा ज़हर है, जिसे हम जानते हुए भी पीते हैं, और एक ऐसी मीठी आदत है, जिसे हम छोड़ना नहीं चाहते। यह हमें एक ही पल में ज़मीन पर गिराती है और दूसरे ही पल आसमान में उड़ाती है। यही तो मोहब्बत का जादू है! यह हमें रोने के लिए मजबूर करती है, और फिर उसी आँसू में अपनी परछाई देखकर मुस्कुराने के लिए भी।
हम कहते हैं, "मोहब्बत बुरी है," शायद इसलिए ताकि हम जब इस जाल में फँसें, तो हमारी हार थोड़ी कम लगे। मगर यह दिल का खेल है, जहाँ हारना भी एक तरह की जीत है, क्योंकि इसमें जो दर्द मिलता है, वह भी बड़ा मीठा होता है। तो बस, कहते रहिए, "मोहब्बत बुरी है," और करते रहिए, क्योंकि यही तो ज़िंदगी की सबसे रंगीन कहानी है।
आर के भोपाल।