आत्महत्या!
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दस सितंबर को दुनिया आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाती है। लेकिन यह स्मरण केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, समाज के अंतस में उठती एक बेचैन पुकार है। आँकड़े बताते हैं कि आत्महत्या कोई दुर्लभ घटना नहीं रही, यह हमारी संस्कृति और जीवनशैली के भीतर कहीं गहरे पैठा रोग है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में प्रेम का टूटना जीवन तोड़ देता है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात में मानसिक अवसाद आत्मघात की डोर कस देता है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु में नशे की गिरफ्त जीवन की डगर रोक लेती है। उत्तराखंड में करियर की चिंता ही श्मशान तक ले जाती है। एक ही देश में अलग-अलग कारण, पर मंज़िल एक—मृत्यु।
पर ध्यान देने योग्य है कि यह प्रवृत्ति सम्पन्न और शहरी इलाकों में अधिक है। वहाँ अवसर हैं, विकास है, नौकरी है, पर सहारा नहीं। लोग भीड़ में चलते हैं, पर अकेलेपन में गिरते हैं। गाँव अब भी भाईचारे और दखल की पुरानी आदत से किसी हद तक बचाए हुए हैं। वहाँ पड़ोसी का हस्तक्षेप कभी खलता है, पर वही छोटी सी दखल जीवन का धागा भी थाम लेती है।
पिछली पीढ़ी के लोग जीवन से हारकर मठों की ओर भागते थे। पलायन तब भी था, पर जीवन बचा रहता था। आज की पीढ़ी के पास यह पलायन मार्ग नहीं। मंदिरों की बजाय रस्सी की फाँसी उनकी शरण बन गई है। यह परिवर्तन भयावह है।
समस्या यह नहीं कि जीवन कठिन है, समस्या यह है कि कठिन जीवन को सहारा देने वाले हाथ कम हो गए हैं। अवसाद की लहर बहुत गहरी नहीं होती, पर सहारा न मिले तो वही हल्की लहर सब कुछ बहा ले जाती है।
जीवन की यह पीड़ा हमें चेताती है कि आत्महत्या रोकथाम कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं, यह सामाजिक संवेदना का प्रश्न है। जब तक मनुष्य मनुष्य के दुःख में सहभागी नहीं बनेगा, तब तक अवसर और सम्पन्नता भी खोखले रहेंगे।
अंततः, जीवन कोई अकेली नाव नहीं, यह एक साझा यात्रा है। मौत के अंधेरे को परास्त करने का उपाय न विज्ञान दे पाएगा, न कानून—यह काम केवल रिश्तों की ऊष्मा, संवाद की रोशनी और स्नेह की बाँहें ही कर सकती है।
आर के झा भोपाल।