भारत की शक्ति और ट्रंप का पछतावा!
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“जो राष्ट्र स्वयं को पहचान लेता है, उसे रोकना असंभव है।” – स्वामी विवेकानंद।
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भारत आज वहीं खड़ा है, जहाँ दुनिया ठिठककर देख रही है। जिन देशों ने कभी हमें “थर्ड वर्ल्ड” कहकर तिरस्कृत किया, वे अब हमारी दहलीज़ पर तकनीक, बाजार और कूटनीति की भीख माँगते हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब ट्वीट में अफसोस जताते हैं—“काश भारत के साथ हमने पहले ही बेहतर सौदे किए होते…”—तो यह पछतावा सिर्फ ट्रंप का नहीं, बल्कि उस पश्चिम का सामूहिक अपराधबोध है जिसने दशकों तक भारत को हल्के में लिया।
भारत के उभार को अब कोई नकार नहीं सकता। 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता कदम, वैश्विक मंच पर निर्णायक उपस्थिति, और तकनीकी क्रांति—ये सब मिलकर बता रहे हैं कि यह वही भारत नहीं है जिसे 1991 में IMF की दहलीज़ पर गिरवी रख दिया गया था।
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“सिंह वही है जो शेर की तरह दहाड़े, और वही राष्ट्र महान है जो अपने ही बल पर उठ खड़ा हो।” – अटल बिहारी वाजपेयी।
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ट्रंप का पछतावा यह स्वीकारोक्ति है कि भारत अब फॉलोअर नहीं, बल्कि ट्रेंडसेटर है। अमेरिका, यूरोप, चीन—सबको समझ आ गया है कि आने वाला शतक एशिया का है, और एशिया में ध्रुवतारा सिर्फ भारत है।
भारत की ताकत सिर्फ GDP या मिसाइलों में नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत आत्मविश्वास में है, जो हजारों साल की तपस्या से जन्मा है। आज जब भारत “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ बनकर खड़ा होता है, तो वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक सन्नाटा छा जाता है।
“संपूर्ण जगत् एक परिवार है”—यह कोई स्लोगन नहीं, बल्कि भारत की असली विदेश नीति है।
इसीलिए अमेरिका जैसे महाशक्ति भी आज पछता रही है कि भारत को बराबरी का साझेदार बनाने में उसने देर कर दी।
भारत अब सौदे का मोहताज नहीं, बल्कि शर्तें तय करने वाला है। ट्रंप का पछतावा एक ट्वीट नहीं, बल्कि इतिहास का फैसला है—21वीं सदी भारत की होगी।
आर के भोपाल।