कश्मीर में अशोक चिन्ह से डर गए मौलाना साहिबान!
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बड़े ताज्जुब की बात है—जिसे देखकर पूरी दुनिया भारत की पहचान करती है, वही अशोक चिन्ह हज़रतबल दरगाह में देखकर अचानक कुछ लोगों के ईमान को खतरा हो गया।
कहते हैं, दरगाह की दीवार पर बने इस प्रतीक को देखकर उन्हें "मूर्ति पूजा" का भय सताने लगा। पर ग़ज़ब है, वही चिन्ह जब हर मौलाना की जेब में नोट-सिक्के बनकर घूमता है, तो उनके ईमान को ज़रा भी सर्दी-ज़ुकाम नहीं होता। जब मस्जिद, दरगाह, ख़ानक़ाह की दानपेटियों में वही मूर्ति हज़ारों की तादाद में बंद रहती है, तब किसी को तौहीद ख़तरे में नहीं लगती। मगर जैसे ही संगमरमर की पट्टी पर वही प्रतीक उभरा—बस, आस्था को दिल का दौरा पड़ गया!
दरअसल, अशोक स्तंभ किसी धर्म का मूर्ति-चिह्न नहीं है, यह भारत की आत्मा का प्रतीक है। मगर कट्टरता की आँखों में तर्क और राष्ट्र का सम्मान अक्सर अंधा हो जाता है। इसलिए उन्होंने उसे ठोक-पीटकर नष्ट कर दिया और खुद को धर्मरक्षक समझने लगे।
और हाँ, जो गैंग रोज़ "जय मीम-जय भीम" का जुलूस निकालते नहीं थकते—वह सब अब एकदम शांत हैं। वामन मेश्राम की जुबान तालू से चिपकी है, ओवैसी की आवाज़ को साँप सूँघ गया है। वही मानसिकता है जिसने जोगेंद्रनाथ मंडल के सहारे दलितों का कत्लेआम करवाया, बामियान में बुद्ध की मूर्तियों पर तोपें दागीं, और अब अशोक चिन्ह को मूर्ति बता कर अपने ईमान की नुमाइश कर रहे हैं।
कहना न होगा, ये वही जमात है जिनके हिसाब से सिक्के और नोट पर छपी "मूर्ति" इमानी खतरा नहीं है, मगर सरकारी बोर्ड पर वही चिन्ह दिख जाए तो इस्लाम की नींव हिल जाती है।
वाह री जहालत, तेरे तर्क भी कितने मज़ेदार हैं!
आर के भोपाल।