स्त्री का जीवन एक विरोधाभासों से भरा हुआ संसार है। जब वह ऊँचाइयों पर पहुँचती है—चाहे शिक्षा में हो, राजनीति में, व्यवसाय में या कला में—तो समाज उसे उसकी लगन, उसकी मेहनत और उसके आत्मबल का फल मानता है। लोग कहते हैं—“देखो, उसने अपने पुरुषार्थ से इतिहास रचा।” वहाँ स्त्री की सफलता उसकी अपनी होती है।
परन्तु विडम्बना देखिए—जब वही स्त्री किसी कारणवश पतन की ओर जाती है, उसकी असफलता सामने आती है, तो दोषी कौन ठहराया जाता है? प्रायः उत्तर मिलता है—“पुरुष समाज, पितृसत्ता, परम्पराएँ।” मानो स्त्री स्वयं तो नितांत निष्कलुष, नितांत भोली है; उसके जीवन की गाड़ी का पहिया अगर फिसल जाए तो उसकी लगाम किसी और के हाथों में थी।
यह दोहरा दृष्टिकोण ही सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।
क्या स्त्री केवल विजय की भागीदार है और हार की जिम्मेदार नहीं?
क्या वह सचमुच इतनी असहाय है कि अपने पतन की वजह कभी खुद न हो?
या फिर यह समाज की सुविधाजनक सोच है—जहाँ स्त्री को दया का पात्र भी बना लिया जाए और महिमा का शिखर भी, पर उसे जिम्मेदारी का मध्य पथ कभी न दिया जाए?
सच यही है कि स्त्री न तो सदा भोली है और न ही सदा अबला। वह उतनी ही बुद्धिमान है जितनी पुरुष, उतनी ही समर्थ है जितना कोई और मनुष्य। उसकी प्रगति का श्रेय भी उसे ही है और उसका पतन भी उसी का जीवन-निर्णय है। पुरुष समाज बाधक हो सकता है, परन्तु पूरी जिम्मेदारी केवल बाहर के कारकों पर डालना स्त्री की सामर्थ्य को कम आंकना है।
यदि हम सचमुच स्त्री को सशक्त देखना चाहते हैं तो यह स्वीकार करना होगा कि वह अपने उत्थान की भी स्वामिनी है और अपने पतन की भी उत्तरदायी। दया की चादर ओढ़ाकर उसे निर्दोष मान लेना, वस्तुतः उसकी असली शक्ति को नकारना है।
स्त्री भोली है—यह मान्यता केवल सुविधा का भ्रम है।
वह विवेकशील है, निर्णयक्षम है और उसके जीवन की दिशा उसी के हाथ में है।
विजय हो या पराजय—श्रेय और दोष दोनों उसे ही ग्रहण करने चाहिए।