मेरे व्यक्तित्व के शिल्पकार : मेरे गुरुजन!
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मनुष्य का व्यक्तित्व जन्म से नहीं मिलता, वह धीरे-धीरे जीवन की आँच और छाँव में गढ़ा जाता है। जैसे कोई मूर्तिकार कच्चे पत्थर को छेनी-हथौड़ी से आकार देता है, वैसे ही मेरे जीवन को गढ़ने का कार्य मेरे माता-पिता और मेरे गुरुजनों ने किया है।
माँ ने मुझे शब्दों की मिठास दी, पिता ने कर्मठता का पाठ पढ़ाया—पर उन शब्दों में सार भरने और उस कर्मठता को दिशा देने का श्रेय मेरे शिक्षकों को जाता है। वे सिर्फ़ पाठ पढ़ाने वाले अध्यापक नहीं थे, वे मेरे जीवन की धड़कनों के संगीतकार थे। उन्होंने मुझे यह सिखाया कि किताबों के अक्षर केवल लिखे हुए शब्द नहीं होते, बल्कि वे अनुभवों और संभावनाओं के द्वार होते हैं।
मेरे विद्यालय के दिनों की स्मृतियों में आज भी वे कक्षाएँ जीवित हैं, जहाँ ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षर किसी मंत्र की तरह चमकते थे। जब कभी मैं भूल करता, तो उनकी डाँट बिजली की तरह गिरती, पर वही डाँट बादलों के बाद बरसती वर्षा की तरह शीतल भी कर जाती। उनकी प्रशंसा मेरे लिए उस धूप की तरह थी, जो ठिठुरते शिशिर में जीवन भर देती है।
सच कहूँ तो मैं मिट्टी था—नर्म, आकारहीन, बिखरा हुआ। मेरे माता-पिता ने मुझे इस धरती पर रखा, लेकिन मेरे शिक्षक ही वे कुम्हार थे जिन्होंने मुझे चाक पर घुमाकर आकार दिया। उन्होंने मेरी कमज़ोरियों को काटा-छाँटा, मेरी खूबियों को सँवारा, और मुझे वह रूप दिया जिसे आज लोग मेरा व्यक्तित्व कहते हैं।
मेरे जीवन की दिशा, मेरे विचारों की गहराई, मेरे निर्णयों की दृढ़ता—सबमें मेरे गुरुजनों की छाप अंकित है। जब-जब मैं किसी उलझन में पड़ता हूँ, उनकी कही पंक्तियाँ, उनके दिए सूत्र, किसी दीपक की लौ की तरह अँधेरे में मेरा मार्गदर्शन करते हैं।
शिक्षक वास्तव में केवल विद्यालय के चार दीवारों में सीमित नहीं होते; वे जीवन के हर पड़ाव पर साथ चलते हैं। उनका योगदान उतना ही अमिट है जितना गंगा का जल, जो प्यास बुझाकर चुपचाप बहता चला जाता है।
आज अगर मैं किसी भी रूप में उपयोगी हूँ, अगर मुझमें विचार करने की क्षमता है, बोलने का साहस है, और जीने की समझ है, तो यह मेरे माता-पिता की परवरिश और मेरे शिक्षकों के तप का परिणाम है।
आर के भोपाल।