“कमरे का आईना”
रात के ठीक 12 बजे रिया अपने कमरे में बैठी थी। बिजली बार-बार जा रही थी, और मोबाइल की टॉर्च ही उसका सहारा था। कमरे की दीवार पर टंगा पुराना आईना अचानक उसकी नज़र में आया।
जैसे ही उसने टॉर्च की रोशनी आईने पर डाली—उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
क्योंकि आईने में वही कमरा दिख रहा था… लेकिन उसमें वो अकेली नहीं थी!
पीछे धुंधली परछाई में एक औरत खड़ी थी, जो धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।
रिया ने पीछे मुड़कर देखा—कमरा खाली था।
फिर से आईने की ओर देखा—औरत वहीँ थी, और इस बार उसका चेहरा और साफ़ नज़र आ रहा था।
रिया ने डरते-डरते मोबाइल टॉर्च बंद कर दी। अंधेरे में पूरा कमरा सन्नाटा ओढ़े बैठा था। लेकिन आईने से फुसफुसाने की आवाज़ें आने लगीं—
"तुम्हें यहाँ नहीं रहना चाहिए… ये कमरा मेरा है…"
रिया काँपते हाथों से आईने को ढकने गई, तभी आईने के शीशे पर खून के धब्बे उभर आए और वो औरत शीशे के अंदर से बाहर आने लगी!
उसकी लम्बी उंगलियाँ काँच को अंदर से खरोंच रही थीं—चरर्र… चरर्र…
रिया चीखते हुए दरवाजे की ओर भागी, लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था।
पीछे देखा—आईना पूरी तरह लाल हो चुका था। और अब उसमें दो रिया दिख रही थीं।
एक, जो कमरे में खड़ी कांप रही थी…
और दूसरी, जो आईने से बाहर निकलकर धीरे-धीरे उसकी तरफ मुस्कुरा रही थी।
कमरा चीखों से भर गया… और सुबह जब दरवाज़ा खोला गया, कमरे में सिर्फ़ एक रिया थी।
पर कोई नहीं जान पाया—असली रिया कौन थी, और नकली कौन…
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