सुर्ख चश्म-गोशा में अश्क़बार हो रही है,
लम्हा-दर-लम्हा ज़िन्दगी बेज़ार हो रही है।
बहते दरिया में जैसे कोई तूफ़ान उठे,
आब-ए-चश्म भी समंदर-सी ख़ार हो रही है।
तुझको नज़रों से ही देखूं ये ज़रूरी तो नहीं,
पर नज़र को हसरत-ए-दीदार हो रही है।
बालिश्त भर इज़ाफ़ा फ़ासलों में आ गया है,
दरमियाँ दोनों के कोई दीवार हो रही है।
रुख़-ए-क़ज़ा का अब डर मुझको बाक़ी नहीं,
रेज़ा-रेज़ा ज़िन्दगी मज़ार हो रही है।
देख कर मेरी स्याह सफ़्हा-ए-हयात यारों,
अमावस की शब भी शर्मशार हो रही है।
तमाम कोशिशें नाकाम हुई उसको मनाने की "कीर्ति",
ग़लत-फ़हमियों की जीत, दिल की हार हो रही है।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
सुर्ख = लाल
चश्म = आँखें
गोशा = एकांत
अश्क़बार = आँसुओ की बरसात
बेज़ार = खफा, नाराज़
आब-ए-चश्म = आँसू
बालिश्त = ज़रा सा
कज़ा = मौत
मज़ार = कब्र
स्याह सफ़्हा-ए-हयात = ज़िन्दगी के काले पन्ने